जय हिन्द वन्देमातरम

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रविवार, 26 जून 2011

अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री और गरीबी


हमारा देश सदियों से एक कृषि प्रधान देश रहा है और शायद गरीबी प्रधान देश भी. भारत की जनसँख्या इक्कीसवी सदी के इस दौर में भी प्रायः छोटे छोटे गाँव और कस्बों में जीवन यापन करती है. हमारा देश चुकि एक कृषि प्रधान देश है इसलिए हमारी अर्थव्यवस्था और किसानो का गहरा सम्बन्ध है. ठीक उसी तरह किसान और गरीबी का भी सम्बन्ध उतना ही गहरा बन जाता है  . अब जरा हमारे देश में गरीबों की क्या स्थिति है इस पर गौर करे .

  अन्तराष्ट्रीय मान्यताओं के अनुसार १.२५ डॉलर(  लगभग साठ रूपये )से कम कमाने वाला व्यक्ति गरीबी की रेखा के नीचे का व्यक्ति है यदि हम यह मान ले तो करीब चालीस प्रतिशत भारतीय "गरीबी की रेखा" के नीचे आ जाते है.

    लगभग विश्व की एक तिहाई आवादी जो गरीबी की रेखा के नीचे है वे भारत में निवास करते है.
  गरीबी में सबसे ज्यादा योगदान राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण राज्य  उत्तर प्रदेश , बिहार का है सबसे कम    योगदान गोवा का है .

पर यदि योजना आयोग की माने तो ५७८ रूपये /महिना कमाने वाला व्यक्ति गरीबी की रेखा के नीचे आता है. इसका मतलब बीस रूपये से कम प्रतिदिन कमाने वाला व्यक्ति गरीबी की रेखा के नीचे है. ये तो शहर की बात है. गाँव की परिस्थितियों पर नज़र डाले तो स्थिति और भी हास्यास्पद है.गाँव में प्रति दिन १५ रूपये कमाने वाला व्यक्ति गरीबी की रेखा के नीचे है.
जहाँ एक तरफ भारत में गरीबो की यह स्थिति है वहीँ आश्चर्य की बात यह भी है की साल दर साल हमारे देश में करोड़ पतियों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है .  प्रश्न यह उठता है की इस असमानता का क्या कारण है ?

भारत की आर्थिक नीतियाँ...

भ्रस्टाचार और काला धन 

गरीबों के प्रति उदासीनता का भाव (ऊँचे तबके के लोगों का )

अनाज के भण्डारण और वितरण प्रणाली में दोष 

अशिक्षा और बढती हुई जनसँख्या  
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योजना आयोग से गरीबी तो कम हो नहीं रही है सो गरीबों की संख्या को कम करने के लिए गरीबी की रेखा को अपने हिसाब से नीचे खिसका दिया है. संयोग से हमारे माननीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह , योजना आयोग के अध्यक्ष मोंटेक सिंह आहुलिवालिया वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी तीनो अर्थशास्त्र  में विशेष दक्षता रखते है . केवल प्रधानमंत्री का अनुभव देखें तो वे सन १९८५ से १९८७ के बीच भारतीय रिजर्ब बेंक में गवर्नर और  योजना आयोग के उपाध्यक्ष रह चुके है. वे पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के कार्यकाल में एक कुशल वित्त मंत्री माने जाते रहे है. हमारे प्रधानमंत्री के ये अनुभव किस दिन कम आयेंगे ये तो शायद भगवान को ही मालूम होगा.

अब तो सरकार को जागना चाहिए . भ्रस्टाचार को मिटाने के  लिए कारगर कदम उठाने होंगे . काला धन देश में लाने के  प्रयास करने चाहिए . आर्थिक नीतियाँ गरीबो के अनुसार बनाना चाहिए न की उद्योगपतियों के अनुसार .  व्यक्ति की मूलभूत जरुरत की चीजो में सब्सिडी बढ़ानी चाहिए और विलासिता की चीजो से उसकी भरपाई करनी चाहिए.

 इस दिशा में ऊपर से नीचे तक सभी को योगदान करना होगा.हमारे मंत्रियों को भी अपने ऊपर खर्च करते समय ये ध्यान में रखना होगा की वे विश्व की एक तिहाई गरीबों का प्रतिनिधित्व करते है. संसद भवन के केंटिन में जितनी आसानी से हमारे संसद सदस्यों को भोजन  की थाली उपलब्ध हो जाती है उतनी ही आसानी से हर एक नागरिक के मुंह तक निवाला पहुचना ही  होगा.

आप लोगों को क्या लगता है...?



28 टिप्‍पणियां:

Smart Indian ने कहा…

विचारणीय मुद्दा! अर्थशास्त्र के यह विद्वान पुरुषों को मानवता और समाज शास्त्र में प्रशिक्षण की बडी आवश्यकता है।

रविकर ने कहा…

असमानता के कारण -----

भारत की आर्थिक नीतियाँ...

भ्रस्टाचार और काला धन

गरीबों के प्रति उदासीनता का भाव (ऊँचे तबके के लोगों का )

अनाज के भण्डारण और वितरण प्रणाली में दोष

अशिक्षा और बढती हुई जनसँख्या

SANDEEP PANWAR ने कहा…

ये इस देश का बुरा नसीब है।

दिवस ने कहा…

बहन रेखा जी केवल विद्वान् होने से ही कुछ नहीं होता, ईमानदार भी होना चाहिए...हमारे प्रधान मंत्री की यही समस्या है कि वे अर्थशास्त्र के विद्वान् हैं किन्तु ईमानदार नहीं हैं...बहुत से लोग यह समझते हैं कि इस मंत्रिमंडल के सभी नेता भ्रष्ट हैं किन्तु प्रधानमन्त्री ईमानदार हैं जो कि हास्यास्पद है...
मनमोहन सिंह के बहुत से किस्से मुझे भी मालुम हैं...

बहरहाल आपका यह आलेख बेहद प्रशंसनीय है...गरीबी पर ध्यान केन्द्रित किया गया है, इसे तो मिटाना ही चाहिए और एक ओर हमारे प्रधान मंत्री हैं कि उनसे गरीबी तो मिटती नहीं तो अब गरीबों को ही मिटाने में लगे हैं...

अभिषेक मिश्र ने कहा…

संसद भवन से तुलना कर आपने चीजें और भी स्पष्ट कर दी हैं. विचारणीय पोस्ट.

sm ने कहा…

yes time has come to accept the reality and poverty of India and corruption and remove it.

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

सारे आंकड़े और आज हालात इस देश के दुर्भाग्य को सामने रखते हैं.....

Rakesh Kumar ने कहा…

गरीबी हमारे देश में हमेशा से चिंतनीय अवस्था में रही है.इन्द्रा गाँधी ने 'गरीबी हटाओ' का नारा देकर सत्ता भी पायी थी.परन्तु,अब मुद्दा भृष्टाचार मिटाओ का होता जा रहा है.बहुतों को लगता है गरीबी काले धन की वापिसी से होगी.मेरा मानना है कि जबतक विचार व आचरण शुद्ध न हों,नेक नियत व ईमानदारी न हो,अपने अपने काम के प्रति व देश के प्रति निष्ठा न हो,आलस्य न हो ,तबतक गरीबी हट जायेगी,ऐसा नहीं लगता.
आपकी प्रस्तुति सुन्दर व सार्थक है.
मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है.

vijai Rajbali Mathur ने कहा…

आपके पाँचों प्वाइंट सही हैं.इन अर्थशास्त्रियों से कुछ नहीं होगा ,ये कठपुतलियाँ हैं.'उत्पादन और वितरण'के साधनों पर समाज का नियंत्रण स्थापित करके ही सभी समस्याओं का निदान किया जा सकता है.

नीरज गोस्वामी ने कहा…

जानकारी से भरपूर आपकी ये पोस्ट आँखें खोल देने वाली है...इसे जन जन तक पहुंचना चाहिए.

नीरज

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

बहुत सटीक एवं तार्किक लेख.
एक सच को सबके सामने रखने के लिए साधुवाद!

Unknown ने कहा…

एक कड़वा सत्य !
मेरी नयी पोस्ट पर आपका स्वागत है : Blind Devotion - सम्पूर्ण प्रेम...(Complete Love)

virendra sharma ने कहा…

ये जितने नाम आपने गिनाये हैं ये सबके सब बिजूके हैं .नर्सिम्हान जी का कार्य काल और था अब देश में मुसोलिनी के लिए खुफिया गिरी करने वाली विरासत का राज है .आम आदमी की जेब में इन्हीं लोगों का हाथ है .संसद की थाली और आब दोनों बहुत सस्तीं हैं इसीलिए तो यह सब झमेला है ,आम आदमी अकेला है .

G.N.SHAW ने कहा…

economy ki padhaayi chhode bahut din ho gayaa . sab we bhul gayen hai

नश्तरे एहसास ......... ने कहा…

the situations that are simply asking for little efforts of government are being just overlooked by our govt. and its making day by day the situations worst.planning commission of india had become planning commission of ministers.
very nice article ma'am.

upendra shukla ने कहा…

aaj aapne mere man ki baat kah di
"samrat bundelkhand"

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

दिल दहला देते हैं इतने सही आंकड़े .....

देश अपने दुर्भाग्य पर रो रहा है ...

हम सबको अपनी नयी भूमिका का निर्वहन करना होगा ......स्वस्थ और स्वच्छ भारत बनाने का सपना

amrendra "amar" ने कहा…

विचारणीय मुद्दा! एक कड़वा सत्य !

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

अच्छी जानकारी

Vivek Jain ने कहा…

विचारणीय मुद्दा,
बधाई,
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

Bharat Bhushan ने कहा…

केवल प्रधानमंत्री के इमानदार होने से कुछ नहीं होता. उसके आसपास कौन है और उद्योगपतियों की सुनने की आवश्यकता क्यों है इसके परीक्षण की ज़रूरत है.

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

very very post.

amrendra "amar" ने कहा…

sartahk vicharo ke liye bahut bahut badhai.kash apki baat her artshastri tak khas taur se hamare pradhanmantri ji tak to jarur pahunche......jo itne bade arthshastri hone ka dum bharte hai ...........unhe kuch kyu nahi dikhta ya we dekhna nahi chahte.........

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

काफ़ी रोचक डाटा है आपके पास ! सुन्दर प्रयास !

सुरेन्द्र "मुल्हिद" ने कहा…

khoobsoorat sansmaran!

Rohit ने कहा…

rekha ji प्रधान मंत्री का आकलन करने से पहले यह देखना होगा की उनके अनुभव का कितना फायदा हो रहा है...किसको हो रहा है.....दरअसल यही समस्या है की जिस देश में कृषि आज भी मुख्या जरिया है पेट भरने का उसकी तरकी की निति बनाने के लिए खलिश उद्योगिक अर्थ शास्त्री से उम्मीद करना ही फिजूल है...रेसेर्वी बैंक के गोवेर्नोर को देश की कृषि से लेना देना इतना ही होता है की वो बता सकता है की मुद्रा स्फीति कितनी कृषि के कारन बदती है और कितनी घटी है....

Fani Raj Mani CHANDAN ने कहा…

इस पोस्ट के ज़रिये आपने बड़े महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डाला है.

आभार स्वीकारें
फणि राज

Ravikant yadav justice league ने कहा…

बहुत खूब आप मेरी रचना भी देखे ...........