हमारा देश सदियों से एक कृषि प्रधान देश रहा है और शायद गरीबी प्रधान देश भी. भारत की जनसँख्या इक्कीसवी सदी के इस दौर में भी प्रायः छोटे छोटे गाँव और कस्बों में जीवन यापन करती है. हमारा देश चुकि एक कृषि प्रधान देश है इसलिए हमारी अर्थव्यवस्था और किसानो का गहरा सम्बन्ध है. ठीक उसी तरह किसान और गरीबी का भी सम्बन्ध उतना ही गहरा बन जाता है . अब जरा हमारे देश में गरीबों की क्या स्थिति है इस पर गौर करे .
अन्तराष्ट्रीय मान्यताओं के अनुसार १.२५ डॉलर( लगभग साठ रूपये )से कम कमाने वाला व्यक्ति गरीबी की रेखा के नीचे का व्यक्ति है यदि हम यह मान ले तो करीब चालीस प्रतिशत भारतीय "गरीबी की रेखा" के नीचे आ जाते है.
गरीबी में सबसे ज्यादा योगदान राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश , बिहार का है सबसे कम योगदान गोवा का है .
पर यदि योजना आयोग की माने तो ५७८ रूपये /महिना कमाने वाला व्यक्ति गरीबी की रेखा के नीचे आता है. इसका मतलब बीस रूपये से कम प्रतिदिन कमाने वाला व्यक्ति गरीबी की रेखा के नीचे है. ये तो शहर की बात है. गाँव की परिस्थितियों पर नज़र डाले तो स्थिति और भी हास्यास्पद है.गाँव में प्रति दिन १५ रूपये कमाने वाला व्यक्ति गरीबी की रेखा के नीचे है.
जहाँ एक तरफ भारत में गरीबो की यह स्थिति है वहीँ आश्चर्य की बात यह भी है की साल दर साल हमारे देश में करोड़ पतियों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है . प्रश्न यह उठता है की इस असमानता का क्या कारण है ?
भारत की आर्थिक नीतियाँ...
भ्रस्टाचार और काला धन
गरीबों के प्रति उदासीनता का भाव (ऊँचे तबके के लोगों का )
अनाज के भण्डारण और वितरण प्रणाली में दोष
अशिक्षा और बढती हुई जनसँख्या
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योजना आयोग से गरीबी तो कम हो नहीं रही है सो गरीबों की संख्या को कम करने के लिए गरीबी की रेखा को अपने हिसाब से नीचे खिसका दिया है. संयोग से हमारे माननीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह , योजना आयोग के अध्यक्ष मोंटेक सिंह आहुलिवालिया वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी तीनो अर्थशास्त्र में विशेष दक्षता रखते है . केवल प्रधानमंत्री का अनुभव देखें तो वे सन १९८५ से १९८७ के बीच भारतीय रिजर्ब बेंक में गवर्नर और योजना आयोग के उपाध्यक्ष रह चुके है. वे पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के कार्यकाल में एक कुशल वित्त मंत्री माने जाते रहे है. हमारे प्रधानमंत्री के ये अनुभव किस दिन कम आयेंगे ये तो शायद भगवान को ही मालूम होगा.
अब तो सरकार को जागना चाहिए . भ्रस्टाचार को मिटाने के लिए कारगर कदम उठाने होंगे . काला धन देश में लाने के प्रयास करने चाहिए . आर्थिक नीतियाँ गरीबो के अनुसार बनाना चाहिए न की उद्योगपतियों के अनुसार . व्यक्ति की मूलभूत जरुरत की चीजो में सब्सिडी बढ़ानी चाहिए और विलासिता की चीजो से उसकी भरपाई करनी चाहिए.
इस दिशा में ऊपर से नीचे तक सभी को योगदान करना होगा.हमारे मंत्रियों को भी अपने ऊपर खर्च करते समय ये ध्यान में रखना होगा की वे विश्व की एक तिहाई गरीबों का प्रतिनिधित्व करते है. संसद भवन के केंटिन में जितनी आसानी से हमारे संसद सदस्यों को भोजन की थाली उपलब्ध हो जाती है उतनी ही आसानी से हर एक नागरिक के मुंह तक निवाला पहुचना ही होगा.
आप लोगों को क्या लगता है...?
