जय हिन्द वन्देमातरम

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रविवार, 5 जून 2011

सरकार की दबंगई


कल सुबह बाबा रामदेव का सत्याग्रह दिल्ली के रामलीला मैदान में शुरू हुआ.

सत्याग्रह में शामिल होने के लिए भारत के विभिन्न हिस्सों से लोग दिल्ली पहुंचे थे. सुबह से शाम तक विभिन्न धार्मिक ,आध्यात्मिक संघटनो एवं  समुदायों का भरपूर समर्थन उन्हें मिलता रहा .


 समर्थन से सत्याग्रह का जोश भी बढ़ता रहा. 



पर पिछली रात रामलीला मैंदान दिल्ली में जो कुछ भी हुआ वह शायद किसी ने सोचा नहीं  होगा .

 सरकार ने जिस बर्बरता से इस सत्याग्रह के दमन करने का प्रयास किया वह किसी लोकतान्त्रिक देश के लिए तो बहुत ही शर्मनाक है.

दुनिया के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश में अगर सरकार इस तरह से जनता के साथ तानाशाही पूर्ण रवैया अपनाती है तो फिर हम भविष्य में दुनिया के सामने भारत की किस छवि को उजागर करेंगे ?
पिछले कुछ दिनों में बाबा रामदेव और सरकार के बीच जो भी वार्ता और सहमती हुई हो मैं उस विषय में ज्यादा कुछ कहना नहीं चाहती पर जिस प्रकार पुलिस ने सोते हुए व्यक्तियों , महिलाओं , बच्चो और बुजुर्गो के साथ क्रूरता   पूर्ण व्यवहार किया है उसकी जितनी भी  निंदा करे वह कम ही होगा.

सत्याग्रह में शामिल होने आये कई लोग अभी अस्पताल में है उनकी क्या गलती थी ये तो सरकार को ही मालूम होगा.


सरकार या तो सुबह होने का इंतजार कर लेती या मिडिया के माध्यम से बाबा रामदेव को चेतावनी देती . पर सरकार के इस व्यवहार से तो ऐसा लग रहा है की जैसे किसी को वचन दिया हो की सुबह तक रामलीला मैदान जरूर खाली हो जायेगा. 


बाबा के लिए ये आदेश भी सरकार की ओर से जारी कर दिया गया कि वह दिल्ली में १५ दिन तक नज़र न आये.
फिलहाल बाबा कि मुहीम हरिद्वार से  जारी है ...
मुझे कम से कम माननीय प्रधानमंत्री से तो ये उम्मीद नहीं थी. 


शनिवार, 4 जून 2011

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है




इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।
एक चिनगारी कही से ढूँढ लाओ दोस्तों,
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।
एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,
आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है।
एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,
यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है।
निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,
पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है।
दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है।
दुष्यंत कुमार 

मंगलवार, 19 अक्टूबर 2010

कफन

हिंदी साहित्य के लेखकों में प्रमुख लेखक है मुंशी प्रेमचंद. कुछ दिन पहले उनकी एक कहानी पढने का मौका मिला.यह  कहानी हमने अपने अध्ययन काल में भी पढ़ी थी . कहानी का शीर्षक है "कफन ". वैसे तो मैंने मुंशी जी की कई कहानियाँ पढ़ी है .(कफन ,गबन. गोदान ,पूस की रात आदि ). प्रेमचंदजी जितने जमीन से जुड़े हुए लेखक थे और उनकी लेखनी में जितनी यथार्तता स्पस्ट होती है वैसा मैंने किसी और लेखक में महसूस नहीं किया है . उनकी कहानी मानव अंतर्मन को अंदर तक झकझोर जाती है. उन्होंने निम्न वर्गीय समाज की मजबूरी ,गरीबी और उनसे उत्पन्न  निम्न मानसिकता का सजीव चित्रण किया है . इनकी कहानिया पढ़ने के बाद हम  ये सोचने पर मजबूर हो जाते है कि क्या  इंसान इतना हद तक गिर सकता है?
कफन कहानी में भी उन्होंने शराबी बाप बेटे कि निम्न मानसिकता को उजागर किया है.जिसके माध्यम से उन्होंने यह सन्देश दिया है कि शराबी व्यक्ति शायद किसी का भी अपना नहीं होता है. इस कहानी में बेटा अपनी स्त्री कि दर्द भरी चीत्कार सुनकर भी उसके पास सिर्फ इसलिए नहीं जाता है कि कहीं उसका बाप भूने हुए आलू को पूरा साफ न कर जाये. अपनी स्त्री के मरने के बाद उसके कफ़न के पैसे को भी शराबी बाप बेटे शराब पी कर और अपने मनपसंद व्यंजन खा कर उड़ा देते है , साथ ही  जो खाना बच जाता है उसे एक भिखारी को देकर दानी होने के गर्व को पहले वार महसूस करते है. वे अपने मरे हुए जमीर को यह कहकर झूठी तसल्ली देते है कि जो स्त्री जिन्दा रह उनकी  क्षुधा तृप्ति  आखिरी साँस तक करती रही वो मरकर भी उनके अधूरे सपने को  पूरा कर गई .उसकी कफ़न के पैसो को उड़ाने के बाद उसकी आत्मा की शांति के लिए  प्रार्थना भी करते है.
आपको क्या लगता है वर्तमान परिपेक्ष्य में  बाप- बेटे आत्मा की शांति की प्रार्थना भी करेंगे ?

रविवार, 17 अक्टूबर 2010

दशहरे की शुभकामनाये.

सबसे पहले तो दशहरे की शुभ कामनाए . दोस्तों आज के दिन को विजयदशमी और हमारे यहाँ जतरा के नाम से भी जाना जाता है और आज के दिन को बहुत ही शुभ माना जाता है और ये माना जाता है की आज के दिन यदि कोई कार्य आरम्भ किया जाये तो उसमे सफलता निश्चित है . बचपन में इस दिन सुबह से ही हमारे यहाँ नीलकंठ पक्षी की खोज शुरू हो जाती थी . इस पक्षी के बारे में शायद आप लोग जानते ही होंगे कि यह पक्षी शंकर भगवान के नाम से ही जुड़ा हुआ है .हम बच्चे लोग सुबह से ही एक स्थान से दूसरे स्थान तक नीलकंठ की खोज में लगे रहते थे और नीलकंठ को भी शायद पता था की आज उनकी डिमांड ज्यादा है सो नीलकंठ भी और दिनों के मुकाबले बहुत कम ही दिखाई देते थे. एक छत पर यदि नीलकंठ दिख जाये तो उन घरवालों की तो जैसे जिम्मेदारी थी की वोह आस-पास के लोगों को बुला कर उन्हें भी दर्शन कराये. एक बार अगर नीलकंठ के दर्शन हो गए तो समझो की उसके बाद तो पूरा साल शुभ ही शुभ है. उसके बाद सारे लोग नहा धो कर माँ दुर्गा का विसर्जन करने के बाद सभी बड़े बुजुर्गों का आशीर्वाद लेते है .
हमारे मिथिला में तरह तरह के व्यंजन आज बनाये जाते है और विशेष कर तरुआ (पकोड़ा) जरुर बनता है .उसमे भी तिलकोर के तरुए का होना तो एकदम आवश्यक है.हमारे मिथिलांचल के लोग इस तरुए को शौक से खाते और खिलातें है . अब तो में भी तरुआ बना लेती हूँ पर मेरे माँ के हाथ के तरुए का तो को जबाव ही नहीं है. इसी के साथ एक बार फिर से दशहरे की आप सभी को शुभ कामनाये. विशेष कर राज को जिन्होंने कल से ही ब्लॉग लिखना प्रारम्भ किया है.

शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

वो बीते दिन याद है

बचपन में हम अक्सर गर्मी की छुट्टियाँ गाँव में बिताते थे . उस समय गाँव में इतना अपनापन था कि हमारे टोले में रहने वाले सारे घर अलग-अलग होते हुए भी एक परिवार जैसे थे . जब हम लोग शहर से गाँव पहुचते थे तो जब तक एक एक घर में जाकर हर एक से मिल न लेते थे तब तक अपने घर में चैन से नहीं बैठते थे और गाँव के लोग भी हमें अपने बच्चे की तरह बहुत चाहते थे . इन छुट्टियों के पुरे एक महीने हर सारे भाई-बहन खूब धूम मचाते थे . कोई ज्यादा टोकने वाला भी नहीं होता था. आम का मौसम होता था और आम पुरे घर में बिखरे पड़े रहते थे . हम लोग घर में रहकर आम खाते तो कोई रोकने वाला नहीं होता था.परन्तु हम लोग आम चुराकर पड़ोस के दालान में जाकर आम खाते थे उससे आम खाने का मज़ा कई गुना बढ़ जाता था . हम लोग वैसे तो घर में रहकर लूडो, केरम वगैरा खेलते रहते थे परन्तु जब बड़ो को ताश खेलते देखते तो सोचते की इस खेल को भी हमें आजमाना चाहिए . तो हमने ताश खेलने का अपना ही ढंग इजात कर लिया था . एक बार दोपहर में छत के एक कोने में जहाँ छाया थी वहां बैठकर हमलोग ताश खेल रहे थे तो अचानक वहां कुछ आहट हुई.हमने देखा की एक खली डब्बा लुढ़कर हमारी ओर आ रहा है . हमने सोचा कि आस पास तो कोई है नहीं फिर ये डब्बा लुढ़कर कहाँ से आया , तभी हमारे नाना जी हमारे सामने आ कर खड़े हो गए.हम सबको तो मानो सांप सूंघ गया था . हम सभी नानाजी से बहुत डरते थे . उस ज़माने में बच्चो के हाथ में ताश देखना एक बहुत बड़ी बात होती थी खैर जैसे तैसे उस दिन तो बच गए पर हमें जाने क्यों कोई भी चीज छुपा कर करने में बहुत ही मज़ा आता था.
हम लोग गाँव में जब तक रहते थे नानीजी कि पूजा के लिए फूल ले के आया करते थे. लगभग हर एक परिवार के बच्चे ही फूल लेने जाया करते थे जो जितनी सुबह उठा उसकी फूल की डाली में उतने ज्यादा फूल रहते थे . इसी प्रतियोगिता में एक दिन में और मेरी दीदी ने निश्चय कर लिया की कल सुबह सबसे ज्यादा फूल हमारे घर में आने चाहिए .फिर क्या था रात को जैसे तैसे सोये और आधी रात को ही दोनों उठ के बैठ गए . उस ज़माने में आज की तरह सिरहाने में रखी हुई मोबाइल का बटन दबा कर समय तो देखा जाता नहीं था न ही बच्चो के आस-पास कोई घडी तो होती नहीं थी . इसलिए हम दोनों बहने चांदनी रात को सुबह समझ कर आधी रात को ही फूल तोड़ने निकल पड़े . रात को ही आस पास के घरों से कलियाँ तोड़कर हमने घर पर रख दिया क्योंकि फूल खिलने का समय तो हुआ नहीं था. उसके बाद सुबह में एक बार फिर से फूल तोड़ने के लिए निकले तो आस पास के घरों से तरह तरह के गालियों की आवाज़े सुनाई देने लगी जो कि हमारे लिए थी ये हम बखूबी जानते थे . इसलिए हम लोग एक दूसरे को देखकर मुस्कुरा रहे थे . इसी तरह हमने आम निम्बू और जलेबियाँ भी खूब चुरा चुरा कर खाई थी . निम्बू और जलेबिया खाने पर मम्मी से डांट भी पड़ती थी क्योंकि ये फल इस तरह से खाना पेट के लिए नुकसान दायक होता था. जिनके घर से हम चोरी करते थे वो हमको पिटाई के वक्त बचाने भी आते थे. इस तरह शरारत और मस्ती करते करते पता नहीं कब एक महीना बीत जाता था .
अभी दो ढाई साल पहले हम फिर गाँव गए परन्तु ना तो आपसी रिश्तो में वो मिठास थे ना ही हमारे लिए उनका प्यार ही उनकी आँखों में दिखा हम चाह कर भी वो मस्ती भरे दिन वापस नहीं ला सकते थे. वो दिन काफी पीछे छूट गए थे और शायद कभी वापस आने वाले नहीं थे. हम शायद अपने आप से ही पूछ रहे थे कि ऐसा क्यों ?
क्या हमारी आने वाली पीढ़ी गर्मी कि छुट्टी का मज़ा इस तरह से ले पायेंगे ?

मंगलवार, 3 अगस्त 2010

लोकल ट्रेन और मेरा अनुभव

बात उन दिनों की है जब में मुंबई में नई-नई आई थी और यहाँ की दौर भाग वाली दिनचर्या से एकदम अनजान थी . वैसे तो बचपन में मैंने मुंबई दर्शन की बस से मुंबई दर्शन किया था परन्तु वह तो सिर्फ दर्शन तक सीमित था और यकीन कीजिये मुंबई दर्शन की बस दर्शन ही कराती है . अतः दूसरी बार मुंबई आने के बाद एक बार फिर से मुंबई को देखने की जिज्ञासा होना लाज़मी था
तो फिर बस देर किस बात की थी ,एक बार रविवार की सुबह निकल पड़ी गेट वे आफ इंडिया देखने वो भी मुंबई की लाइफ लाइन कही जाने वाली लोकल ट्रेन में . जाते समय तो सब कुछ ठीक रहा पर लौटने के समय शाम हो चुकी थी और लोकल ट्रेन खचा-खच भरी हुई थी जो की शायद मुंबई वालों के लिए आम बात हो पर मेरे लिए एक नया अनुभव था . अनुभव के साथ साथ इससे सफर करना चुनौती भी थी .
हुआ यूँ कि हमारा स्टेशन आते आते भीड़ इतनी हो चुकी थी कि उतरने वाले उतरने को बेताब थे पर चढ़ने वाले उनको विदा करने को तैयार ही नहीं थे . मैं इस तरह के अनुभव से पहली वार गुजर रही थी और मैंने यह बिलकुल नहीं सोचा था की लोकल ट्रेन की यात्रा इतनी संघर्ष पूर्ण होगी . क्या हुआ की घरवाले तो उतर चुके थे और मैं स्थिति अनुकूल होने की प्रतीक्षा करती रही और ट्रेन चलने लगी फिर किसी तरह मेरे परिवार के लोगों ने मुझे खींच-खांच कर उतार ही लिया .और वह संघर्षपूर्ण यात्रा समाप्त हो ही गई . उसके बाद तो मैंने लोकल ट्रेन से यात्रा न करने का मौन शपथ ग्रहण कर ही लिया था पर मुंबई में रहकर मुंबई की लाइफ लाइन से दूर रहना नामुमकिन ही है आज भी कभी कभी वो स्थितिया हो ही जाती है की लोकल ट्रेन की यात्रा करनी पर ही जाती है . सच मानिये मुंबई के आसपास की जगह को देखने की इच्छा होते हुए भी मैं सिर्फ इसी कारण से वहां नहीं जा पाती हूँ क्योकी आम लोगों की नजरो में लोकल ट्रेन दूर की यात्रा के सफ़र का सुविधा जनक माध्यम है . हमारे पाठको में कई ऐसे व्यक्ति होंगे जो रोज़ लोकल ट्रेन से सफ़र करते होंगे उन्हें मेरी ये बाते शायद अतिश्योक्ति लगे परन्तु काफी दिन मुंबई में रहने के बाबजूद भी आज तक मुंबई की लाइफ लाइन से आज तक नहीं जुड़ पाई हूँ ...
शायद मेरे अन्दर ही इस तरह की स्थिति से जूझने की शक्ति न हो क्योंकि लाखो लोग रोज़ लोकल ट्रेन के द्वारा अपना सफ़र तय करते है और ये उनकी जिन्दगी का हिस्सा बन चूका है .............
आपको क्या लगता है सचमुच हम जैसे लोग इस तरह की संघर्ष पूर्ण स्थिति से बचना चाहते है या फिर
लोकल ट्रेन की यात्रा को थोरा सुविधाजनक बनाया जा सकता है .

इससे बहुत डर लगता है ......ये है मुंबई की लोकल ट्रेन .

सोमवार, 2 अगस्त 2010

चरित्र चित्रण : सुपुत्रे राजनीतिज्ञ

मैंने अब तक यही सुना था की स्त्री चरित्र को समझना टेढ़ी खीर है पर पिछले दिनों हमने मीडिया के माध्यम से एक ऐसे पुरुष चरित्र से अवगत हुए जिसको समझना मेरे लिए तो क्या पुरे देश के लिए एक पहेली थी. एक संभ्रांत राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखने वाले युवक जो आगे चलकर हमारे देश की प्रगति में भागीदार बन सकते थे या फिर देश की युवा पीढ़ी के लिए एक आदर्श स्थापित कर सकते थे . उनके निजी जिन्दगी की उलझने इस तरह सामने आई ऐसा तो उनके परिवार के किसी व्यक्ति ने सोचा था न हम सब ने . उनके पिता जहाँ एक राजनीतिक दल के अग्र पंक्ति के नेता थे और जिनकी छवि एकदम साफ सुथरी मानी जाती थी . उनके संस्कारो की छाया में पले हुए उनकी खुद की संतान ऐसा भी रंग दिखा सकती है ऐसा तो किसी ने सपने मैं भी नहीं सोचा होगा. अकस्मात् उनके पिता का निधन हो जाने के उपरान्त जनता ने उनसे बहुत सी उम्मीदे ज़रूर लगाई होंगी और सोचा होगा की वह एक दिन अपने पिता का उत्तरदायित्व संभालेंगे और भविष्य में ज़रूर कुछ कर दिखायेंगे . आज भी हमारे देश में लडको को ही अपने पिता का सच्चा उत्तराधिकारी माना जाता है और जिनके पुत्र नहीं होते है ऐसा कहा जाता है की उनका नाम को आगे बढ़ाने वाला कोई नहीं है . एक पुत्री के होते हुए भी ये कथन क्या वर्तमान परिपेक्ष में प्रासंगिक है ? इस विषय पर बाद में चर्चा करेंगे .
आज हम उस सुपुत्र के बारे में चर्चा करना चाहेंगे जिन्होंने अपने कर्मो के द्वारा पिता की छवि को धूमिल किया और भविष्य में उनसे कुछ उम्मीद रखना या उनपे विश्वास करना नामुमकिन होगा . हमने ऐसा सुना था कि उनके पिता कि अस्थियां भी विसर्जित नहीं हो पायी और वह नशे में धुत पाए जाते हैं . इस आचरण के परिणाम स्वरूप वह एक बार पुलिस के हत्थे भी चढ़ चुके है . इसके बाद तो उनका एक न एक विवादित रूप सामने आता रहा . उनका पहली पत्नी से सम्बन्ध विच्छेद पहली पत्नी के साथ ख़राब आचरण के कारण हुआ . इसके पश्चात टेलीविजन पर एक रियेलटी शो के दौरान उनकी रंगीन मिजाजी हमारे सामने आ चुकी है इस बात को शायद हम भुला भी नहीं पाए थे कि एक चैंनल पर उनके स्वंवर का समाचार मिला . फिर उन्होंने चैंनल पर सब के सामने विधि विधान से विवाह भी किया परन्तु विवाह के पांच महीने भी पुरे नहीं हुए थे कि पत्नी कि साथ मार- पीट कि खबर आई . बात इतनी बढ़ गई कि पुनः सम्बन्ध बिच्छेद कि अटकले लगाई जाने लगी . परन्तु ऐसा लगता है कि अभी उनका और भी रूप देखना बाकी है . फिलहाल तो वे एक खुशहाल पति पत्नी कि तरह अपने आप को प्रस्तुत करना चाह रहे है . आगे भगवान् जाने .........!!!
हम तो केवल शुभ-कामना ही कर सकते है ...
क्या बच्चो के आस-पास के माहौल एवं उनके माता-पिता के द्वारा दिए हुए संस्कार ही उनके चरित्र निर्माण के लिए काफी है ?

रविवार, 1 अगस्त 2010

"परदेस" का गाना: मेरी महबूबा

वो मूक आग्रह

बात उन दिनों की है जब मैं  कॉलेज में  थी .मै अपने शहर से काफी हद तक अनजान थी और मुझे अपने कॉलेज से घर तक जाने वाले एक ही बस का नंबर पता था जबकि मेरे घर तक जाने के लिए तीन-चार बसे तो थी  ही . मैं अपनी इकलोती जानी पहचानी नंबर वाली बस का इंतज़ार कम से कम आधा घंटा तो करती ही थी . उस दिन मै बस स्टॉप पर खड़े हो कर भी बस का नहीं बल्कि अपने  एक मित्र का इंतज़ार कर रही थी कि उसी इंतज़ार में उस उमस भरी गर्मी में मुझे एक वृद्ध ने अकस्मात ही अपनी ओर आकर्षित किया . वृद्ध व्यक्ति दुबला-पतला, कमजोर सा दिखने वाला मजबूर सा प्रतीत होता था .उसके एक हाथ में रंग बिरंगी खट्टी मीठी गोलियों का पैकेट  था और दुसरे हाथ में पैकेट  से निकली कुछ गोलियां  थी . उसकी आँखों में याचना साफ झलक रही थी . वह इस उम्मीद से  मुझे देख रहा था कि शायद मैं पांच -छ गोलिया तो जरूर ले ही लुंगी . परन्तु में तो अपने दोस्त का इंतज़ार करते करते इतनी झल्ला गई थी कि उसकी तरफ एक उड़ती सी निगाह डाली .

जब उसने यह देखा कि मेरा ध्यान कहीं और है तो उसने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए एक बार फिर से गोलिया लेने के लिए मौन अनुरोध किया परन्तु इस बार उसने अपने पीठ से लगे पेट कि तरफ अपना एक हाथ रखा और एक उम्मीद भरी दृष्टि मुझ पर डाली. वो नज़र मुझे आज भी याद है . और शायद मैं इस घटना को कभी नहीं भूल पाउंगी . उस वक्त मैंने  इसे एक मामूली बात  समझी जो घर से निकलने पर होती रहती है . ऐसा नहीं था कि फूट-पाथ पर इस तरह घूम-घूम कर गर्मी कि दोपहर में छोटी मोटी  चीजे बेचने वाला पहला व्यक्ति देखा हो . मैने अपने तब तक कि जिन्दगी में असहाय वृद्ध  एवं बच्चे या फिर विकलांग व्यक्तियों को सड़क के किनारे मंदिरों के पास रेलवे स्टेशन पर बैठकर भीख मांगते बहुत देखा था परन्तु उस वृद्ध व्यक्ति कि आँखों में जाने कौन से भाव थे जो मुझे आज भी अन्दर तक झकझोर देते है विशेष कर तब जब में किसी ऐसे वृद्ध व्यक्ति को अपना पेट भरने के लिए मजबूरीवश कुछ काम करते हुए देखती हूँ .
जब मेने उसे बिलकुल ही नजरंदाज कर दिया था और अपने दोस्त के साथ बस में चली गई थी तब तक मुझे इस बात का बिलकुल एहसास नहीं था परन्तु जब मै  रात को सोते समय अपनी दिन भर कि घटनाओ को याद कर रही थी तो मेरे आँखों के सामने अकस्मात् ही उस वृद्ध का चेहरा आ गया जिसमे याचना भरी हुई थी . उन दिनों में मानसिक रूप से थोड़ी उलझनों में रहती थी  और अपनी ही परेशानियों में खोयी रहती थी .अपनी कठिनाइयों के बारे में सोचते सोचते अचानक मुझे ये एहसास हुआ कि अन्दर से कोइ आवाज आ रही हो कि मै  अपनी उलझनों में इतनी स्वार्थी हो गई कि मैने एक जरूरतमंद को एकदम नकार दिया .
मेरा ज़मीर मुझसे पुछ रहा था कि मैं  क्या सचमुच उसकी मदद नहीं कर सकती थी ?
इन बातो के लिए क्या मेरे पास बिलकुल वक्त नहीं था ?
क्या मेरे अन्दर इतनी भी इंसानियत नहीं बची थी कि उसके मूक आग्रह को समझ पाती ?

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

मेरा पहला सन्देश

आज मैंने अपने ब्लॉग की शुरुआत की है .इस ब्लॉग के द्वारा मैं अपनी कुछ यादें, कुछ अनुभव ब्लॉग पर पोस्ट करुँगी जो खट्टी ,मीठी कुछ भी हो सकती है . आशा है आप लोग मेरा उत्साहवर्धन करेंगे .